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हलाला पुरुषों के लिए मानसिक सज़ा

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Image result for हलालाइमाम बाक़िर अ. फ़रमाते हैं अल्लाह ने दस पुरुषों का धैर्य,एक औरत को दिया है।

जैसे के मैंने पिछले लेख( 3 तलाक पर हंगामा ) में बतया था के भारत की मुस्लिम महिलाओं की मांग तलाक को ख़तम करने की नहीं है बल्कि तलाक देने की प्रक्रिया को बदलने की है यानी मुस्लिम महिलाओं की मांग है कि जो मुस्लिम पर्सनल बोर्ड ने जो तलाक देने की प्रक्रिया को वेध माना है वो शरियत (पवित्र कुरान) के खिलाफ है ।

भारतीय मुस्लिम महिलाओं की मांग सही है और ऐसा होना चाहिये क्योंकि मुस्लिम पर्सनल बोर्ड के नियम के हिसाब से 3 बार जबानी तलाक कहने से पति पत्नी का दर्जा खतम हो जाता है जबकि शरियत (पवित्र कुरान) में इसकी अनुमति नही देता है ।

एक समय में एक बार ही तलाक दी जा सकती है वो भी शर्तों, नियमों के अधीन गवाहों की उपस्थति में और गवाहों का कर्तव्य है कि पहले दोनों पति पत्नी के बीच समझोता कराने की कोशिश करे, और सारी कोशिशे न काम हो जाये तो महिला के हितों और उसके अधिकारों को उसके पति द्वारा दिलाये और उसके बाद तलाक दी जा सकती है । एवं एक सीमित समय सीमा के अन्दर अगर पति पत्नी में समझोता हो जाये तो दुबारा निकह की भी कोई आवश्यकता नहीं है, लेकिन यदि सीमित समय सीमा के बीत जाने के बाद पति पत्नी में समझोता हो तो दुबारा निकह होना आवश्यक है ।

दुबारा निकह होने के बाद फिर हालत ख़राब हुवे और फिर तलाक दे दी तो अगर सीमित समय सीमा के अन्दर अगर पति पत्नी में समझोता हो जाये तो तीसरी बार निकह की भी कोई आवश्यकता नहीं है लेकिन यदि सीमित समय सीमा गुजरने बाद पति पत्नी में समझोता हो तो तीसरी बार निकह होना आवश्यक है ।

तीसरी बार निकह होने के बाद पति पत्नी के बीच मामलात बिगड़े और फिर तलाक दे दी गई तो सीमित समय सीमा के अन्दर अगर पति पत्नी में समझोता हो जाये तो चोथी बार निकह की भी कोई आवश्यकता नहीं है, परन्तु यदि सीमित समय सीमा के बीत जाने के बाद पति पत्नी में समझोता हो तो इस सूरत में पुरुष का अब उस महिला (पूर्व पत्नी) पर कोई अधिकार नहीं रहा इस लिए क्योंकि यह पुरुष अपनी पत्नी को बार बार तलाक देकर उसपर अत्याचार कर रहा है महिला के धर्य की परीक्षा ले रहा है ।

तलाक देने के बाद का सीमित 3 माह का समय का प्रावधान इसी लिए है क्योंकि इस्लाम यही चाहता है कि जो एक बार रिश्ते में आगया तो वो फिर तोडा न जाये और आपस में समझोता हो जाये ।

बात को आगे बढ़ाने से पहले मेरा एक सवाल है, क्या एक मम्मनित, कुशल व्यक्ति अपनी पत्नी को या अपनी माशुका को किसी दुसरे पुरुष के साथ सहन कर सकता है ? मैं जनता हूँ आप सब का उत्तर नहीं में ही होगा, तो अब बात को आगे बढ़ाते हैं ।

इस्लाम ऐसे व्यक्ति को सज़ा देना चाहता है जो एक महिला को अपनी विरासत समझ कर बार बार उसके अधिकारों का हनन करता है, तो ऐसे में जब वे बार- बार तलाक देता है उसके बाद (पूर्व पत्नी) महिला के साथ कभी रिश्ता नहीं बना सकता है, परन्तु यदि महिला और पुरुष दुबारा रिश्ता बनाना ही चाहते ही हैं तो जब तक महिला किसी दुसरे से निकह ने कर ले और उसके बाद वो तलाक न दे दे जब तक पुराने पति से रिशा नही बन सकता है ।  अब यहाँ इस महिला और नए पति की इच्छा है के वो तलाक दे या न दे और तलाक दे दे तो सीमित समय सीमा के बाद पुराने पति से निकह हो सकता है ।

अब लोग आरोप और इलज़ाम लगाते हैं की यह महिला पर अत्याचार है तो उनके के लिए मेरा यह कहना है कि पहली बात यह सब महिला की इच्छा से किया जाता है,यदि महिला ऐसा न करना चाहे तो न करे किसी प्रकार के दबाव नही डाला जा सकता है ।

दूसरी बात ऐसा नियम बना ही इसी लिए है ताकि लोग तलाक न दे क्योंकि की कोई मम्मनित,कुशल व्यक्ति अपनी पत्नी को या अपनी माशुका को किसी दुसरे पुरुष के साथ सहन कर सकता है पर उसको ऐसा करना पड़ता है दरअसल यह ऐसे व्यक्ति के लिए ऐसी सज़ा है जिस के लिए उसको सारे जीवन उसकी ग़लती का अहसास दिलाती रही गी ।

सत्य यह है तलाक को इस्लाम ने बहुत बुरी क्रिया माना है परन्तु लोगों के अधिकारों का हनन न हो इस लिए तलाक की पुख्ता नियमों के साथ व्यवस्था रखी गई है इस्लाम में तलाक इतना आसान नहीं है जितना हिंदुस्तान के मुसलमानों ने बना रखा है ।

वैसे कुप्रथाए किस समाज किस धर्म- समुदायों में नहीं होती हैं लेकिन कुप्रथाओ का होने का अर्थ यह नहीं है कि कुप्रथाए समाप्त नहीं सकती हैं ख़तम हो सकती हैं पर उसके लिए इच्छा शक्ति की आवश्यकता होती है राजनीति शक्ति की नहीं ।

खैर भारत में तो ऐसी ऐसी कुप्रथाये हैं जिन को यदि में लिखने बैठ जाओ तो सुबह से शाम और शाम से रात हो जाये गी पर मुझ को इस से कोई लेना देना हैं बस इतना कहना है सत्य बोलो लोगों के बीच प्रेम को जन्म दो न की किसी एक बिंदु को लेकर उसपर तीखी और कडवी भाषा का इस्तेमाल करो, जिस के बारे में आप जानते नहीं उसकी आधी अधूरी जानकारी के साथ उस पर बहस करना उचित नहीं है खास कर के किसी धर्म पर प्रशन उठाना तो बिल्कुल ऐसा ही है ठीक वैसे ही जैसे किसी एक काबिल डॉक्टर से बोला जाये आप को मेरा इलाज ऐसा करना चाहिये जैसे मैं कहता हूँ ।



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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
October 22, 2016

आप यकीनन इस्लाम की बाबत मुझसे ज़्यादा जानते हैं । लेख में वर्णित आपके अधिकांश विचारों से मैं सहमत हूँ । लेकिन आप भी तो देखिए कि हलाला पुरुषों के लिए तो मानसिक सज़ा है पर महिलाओं के लिए क्या है ? पुरुष पर तो मानसिक भार आगे जाकर तब पड़ेगा जब वह हलाला से आई हुई अपनी बीवी से दोबारा निकाह करेगा लेकिन महिला के शरीर और आत्मा पर जो गुज़रेगी, वह तो पहले ही गुज़र जाएगी । उसके बाद वह चाहे अपने पहले खाविंद से दोबारा निकाह कर भी ले, क्या वह ताज़िन्दगी सामान्य हो सकेगी ? क्या जो कुछ उसके साथ हो चुका है, उसके बाद उसका मन एक ख़ुशनुमा ज़िंदगी जी सकने वाली औरत के मन में फिर से बदल सकेगा । आपकी बात ठीक है कि आधी-अधूरी जानकारी की बुनियाद पर बहस नहीं होनी चाहिए । लेकिन इस बात पर बहस की कोई गुंजाइश नहीं है कि औरत को इंसाफ़ मिलना चाहिए । मर्द को सज़ा देने के नाम पर औरत पर ज़ुल्म को जायज़ कैसे ठहराया जा सकता है ? और आज के ज़माने में, ख़ास तौर पर हमारे सेक्यूलर मुल्क में, पर्सनल लॉ जैसी चीज़ के होने का कोई मतलब नहीं है । पर्सनल लॉ के नाम पर कुदरती इंसाफ़ को दरकिनार नहीं किया जा सकता । इंसाफ़, इंसानियत और मुल्क पहले हैं, मजहब उसके बाद ही आता है । यह बात हर मजहब के मानने वालों के लिए है, सभी धर्मावलम्बियों पर लागू है ।


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