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नव नियुक्त जज की 34 वर्ष पूर्व दिन दहाड़े हत्या हुई थी पर न्याय आज तक नही

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34 वर्ष से एक वकील की आत्मा न्याय का इंतज़ार कर रही है। क्या आप एक वकील को न्याय दिला सकते हैं ?

19 सितम्बर 1981 शनिवार के दिन उत्तर प्रदेश के जिला मुरादाबाद  (अमरोहा) के  नौगावां सादात में एक ऐसे मनुष्य की दिन दहाड़े हत्या कर दी गई जो लोगों को कानून के ज़रीय उनके हक़ को दिलाता था।

मैं बात ऐसे इंसान की कर रहा हूँ जिनका नाम एडवोकेट सईद अख्तर आब्दी (कल्लन) था जिनका जन्म एक किसान परिवार के यहां हुआ था पढाई लिखाई में बचपन से रूचि रखते थे। शुरू की शिक्षा मदरसा बाबुल इल्म से हासिल और उसके बाद अबु मुहम्मद सेकंडरी स्कूल से 8वा पास किया उसके बाद अपने पिता से आगे पढ़ने की इच्छा ज़ाहिर की पिता जी ने अपने बेटे की लगन को देखते हुवे राज़ी हो गए और 15 किलो मीटर दूर अमरोहा के  राजकीय इण्टर कॉलिज में 9 कक्षा में प्रवेश दिलाया और वही रहने का इंतेज़ाम कराया और उन्होंने  10कक्षा , 12 कक्षा में  1st क्लास पास की जिस से उनके पिता सईद अख्तर से बहुत खुश हुए और खुश होने वाली बात भी थी  जब बेटा लायक होता है तो ख़ुशी तो होती ही है।

सईद अख्तर आब्दी को इण्टर में अच्छे नंबर होने की वजह से अलीग़ढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में Bsc में प्रवेश मिल गया और AMU से Bsc कर के LLB करने की ठान ली और ऐसा ही हुआ अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से बी एस सी पास की और उसके बाद मुरादाबाद के हिंदू कॉलिज में LLB  में प्रवेश ले लिया।

और साथ ही साथ समाज सेवा भी शुरू कर दी LLB समाप्त होते होते समाज सेवा करते करते कुछ लोग उन के दुश्मन बन गए वजह थी गैर कानूनी धंधों पर अंकुश लगवाना समाज में गलत कृतियों को समाप्त करना , जिस में सबसे बड़ा मुद्दा दहेज़ प्रथा, शिक्षा को बढ़ावा देना आदि जैसे मुद्दे थे।।

एक तरफ लोकप्रियता बड़ रही थी पुरे जिला मुरादाबाद के सब से बड़े वकीलों में नाम गिना जाने लगा था जिस केस को लड़ते अपने ज्ञान से जीत जाते थे।

लोगों का यहां तक कहना है के गरीबों के तो मसीहा थे अगर किसी गरीब के साथ कोई अन्याय होता दिखता तो वही पहुंच जाते और ज़रूरत पड़ती तो अपने पास से उसके लिए पैसे खर्च कर के केस लड़ते थे। तन मन धन से लोगों की सेवा , सहायता करना उनका परम कर्तव्य था।

अब आगे की यह सच्ची कहानी पढ़े तो आप को मालूम होगा के एक ईमानदार आदमी के साथ इस समाज में किया किया जाता है

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कुछ लोगों को उनकी समाज सेवा करना हज़म नही हो रही थी।! ज़ालिमों , बदमाशों , दुश्मनो और राक्षसों ने मिलकर एडवोकेट सईद अख्तर आब्दी (कल्लन) की कई बार हत्या करने की कोशिश की!

पर जब वे अत्याचारी अपने मंसूबों में जब सफल न हो सके तो वे एक रात उन के घर उनको और उनके पुरे परिवार की हत्या करने के उदेश्य से बंदूके लेकर उनकी कोठी जो के बुध चौराहे पर थी उसमे रात के काले अँधेरे में दिवार कूदकर चोरी से घुस गए और गोली चलाई “वकील साहब” को और उनकी “पत्नी” को गोली लग गई!

शेरे दिल बहादुर “सईद अख्तर आब्दी (कल्लन)” ने अपनी हिम्मत न छोड़ी और अपनी लाइसेंसी बंदूक से मुक़ाबला किया और उन ज़ालिमों को भागने में सफल रहे ।

पर अपनी पत्नी को न बचा सके पर बच्चों को उन ज़ालिमों से बचा लिया और खुद ने बेहोश होने से पहले ही ज़ालिमों , बदमाशों , दुश्मनो और राक्षसों के नाम अपने हाथों पर लगे खून और पेट में लगी गोली से रिसने वाले खून से दिवार पर लिख दिए हालत बहुत नाज़ुक थी पुलिस ने दिल्ली AIMS  में भेज दिया जहां उनको लम्बे इलाज के बाद दूसरा जीवन मिला।

पर अफ़सोस इस वारदात में भी हमेशा की तरह पुलिस को ख़रीदा गया और इस वारदात को हत्या नही डाका , लूट साबित करने की कोशिश की परन्तु सईद अख्तर आब्दी (कल्लन) ने अदालत में इस वारदात को हत्या साबित करने की दिशा में लेकर गए।

यह केस आज भी जिला अदालत में इंसाफ की मांग कर रहा है। आज तक यह केस अटका क्यों है आप को आगे की कहानी पढ़कर पता चल जायेगा।

इस मुश्किल घडी में भी सईद अख्तर आब्दी (कल्लन) ने PCS Judicial का इम्तेहान दिया और अल्लाह ने किया के उनकी मेहनत और ज्ञान शिक्षा ने इस परीक्षा में लम्बी प्रकृया के बाद पास करा दिया और उनकी नियुक्ति मुंसिफ (जज) के रूप में राजिस्थान के जयपुर के लिए की गई।

इस बात की सूचना पुरे इलाक़े में हो गई परिवार वाले खुश थे, मित्र सब गॉव वाले बहुत खुश थे पर कुछ  लोगों के और उन दुश्मनो के सीने पर सांप लौटने लगे। जो उनकी पत्नी के हत्यारे थे वो जानते थे के यह एक काबिल वकील के साथ साथ उस वारदात में गवाह भी है और यदि यह जज बन गया तो हम को सज़ा होनी ही हैं इसी लिए अब दुश्मनो को आभास हो चूका था के यदि यह जज बन गया तो इसकी सुरक्षा बढ़ जाये गी और इसको इस दुनिया से हटाना मुश्किल हो जायेगा और अब हमे भी सज़ा हो सकती है  इसी लिए उन आतंकवादिओं ने एक ईमानदार वकील और एक ईमानदार जज होने वाले को अपने रस्ते से हटाने का पूरा चड़्यंत्र रच डाला।

मुंसिफ (जज)  की खबर को सुनकर नौगावां सादात के कुछ दलालों,ज़ालिमों , चोरों की रात की नींद भाग चुकी थी मानों जैसे आज के “संघम फिल्म” में अजय देवगन के आने से विलयनों की नींद भाग जाती है।

इसी वजह से मुंसिफ (जज) का पदभार लेने से पहले ही उनकी हत्या करने की साज़िश रच ली , शेरे दिल जज सईद अख्तर आब्दी (कल्लन) को 21 सितम्बर 1981 को पदभार लेना था उसके लिए 20 सितम्बर को जयपुर जाना था इस की जानकारी लुच्चों ,लफंगों, बदमाशों , कमीनों को हो चुकी थी और वो इस आखरी मौके को गवाना नही चाहते थे।

कहते हैं के सब से बड़ा दुश्मन वो होता है जो दोस्ती का कवच पहने होता है और सब से बड़ा दोस्त वो होता है जो आप के बुरे समय में काम आये मैं जो सच्ची कहानी लिख रहा हूँ इस कहानी में दोनों श्रेणी के दोस्तों को बताना चाहता था पर मैं फ़िलहाल ऐसे दोस्तों  की बात करूंगा जिस ने अपने  मित्र के साथ साथ जान दे दी और दूसरे ने अपनी जान की बाज़ी लगाई और क़ातिलों के खिलाफ गवाही दी।

19 सितम्बर 1981 शनिवार सुबह का समय 6.30 बजे एक लड़का वकील साहब के पास आता है  कही ले जाने के लिए,

बताया जाता है के यह लड़का वकील साहब से एंग्लिश पढ़ने आता था उस पर पूरा यकीन था आखिर एक शिष्य गुरु के साथ न फ़रमानी कैसे कर सकता है।

बहराल यहां यह बताना ज़रूरी है के वकील साहब को जिस के घर जाना था वो एक ऐसे आदमी का था जिस  के लिए वकील साहब ने उनके लिए एक ज़मीन का केस जीता था जिस की बधाई देने उस आदमी के घर जाना था।

वैसे जाना तो  गुज़री हुई रात को था पर उस भले आदमी को ज़ालिमों के मंसूबों को पता चल गया और उन्होंने अपने घर न आने का सन्देश भेजा के वकील साहब आप रात में मेरे घर न आये आप की जान को खतरा है सुबह को आ जाना।

इसी लिए उनका शिष्य उनको सुबह को  बुलाने आया तो वकील साहब जाने के लिए तैयार हो गए उनकी माता ने अपने दिल के टुकड़े से कहा अपनी लाइसेंसी बंदूक साथ लेकर जाओ पर मालूम नही उन्होंने क्यों बंदूक ले जाने से मना कर दिया।

उनकी माता को किया मालूम था के यह मेरे दिल का टुकड़ा अब कभी न आ पायेगा।

वकील साहब अपने घर खस्सी दरवाज़े से निकले और अपने सबसे बड़े , सच्चे दोस्त अफसर आलम साहब (सामाजिक कार्यकर्ता ) के घर सलाम करने और मिज़ाज पुरसी के लिए  आवाज़ लगाई।

मिज़ाज पुरसी करने के बाद अफसर आलम साहब ने कहां के आप जहां जा रहें हैं मैं भी आप के साथ चलता हूँ और सुबह के समय 6.50 दोनों दोस्त पक्के इमाम बारगाह के सामने वाले रस्ते से मोहल्लाः बड़ी इमली जाने के लिए निकले  सड़क पर दूर दूर कोई नही था।

आगे बढे मस्जिद क़ुदरत अली को पार किया थोड़े आगे बढे और मस्जिद अबु तालिब तक पहुंच गए। मस्जिद से 5 खदम आगे बढ़ाये तो देखा एक आदमी चादर ओढ़े नाली के डंडे पर बैठा है और वकील साहब को देखकर खड़ा हुआ और हाथ मिलाने को हाथ बढ़ाया इधर से वकील साहब  ने बढ़ाया जैसे ही हाथ बढ़ा उधर से उस चादर ओढ़े आदमी जिस का नाम “अकरम” था उसने छुरा वकील साहब के पेट में मारा इतने कुछ वकील कल्लन और उनके मित्र अफसर आलम समझ पाते के सूअरों की तरह एक झुंड़ 8-10 लोग आ कर वकील कल्लन पर छुरों से हमला करने को  टूट पड़े ।
उनके मित्र अफसर आलम ने इस का विरोध किया तो उन से कहा गया तुम यहां से चले जाओ नही तो हम  तुम को भी मार देंगे।

पर एक सच्चा मित्र अपने दोस्त को परेशानी के समय में अकेला नही छोडता। अफसर साहब ने उन ज़ालिमों से कहा के मैं अपने मित्र के साथ ऐसा ज़ुल्म होता नही देख सकता जहां मेरे भाई और दोस्त का खून बहेगा मेरा भी वही बहेगा और यह कहते हुवे ज़ोर ज़ोर चीख कर आसपास वालों से सयाहता मांगी मोहल्ले वालों के घर के दरवाज़ों को बजा कर उनके घरों से निकलने का आग्रह किया पर आसपास वालों ,मोहल्ले वालों पर तो जूं तक नही रेंगी।

जब ज़ालिमों ने देखा के यह कुछ ज़्यादा विरोध कर रहें है तो उनपर भी हमला कर दिया, लोग बताते हैं अफसर साहब ने एक ऐसे घर का दरवाज़ा बजा रहे थे जिन के यहां बंदूक थी और यदि वे चाहते तो यह वारदात होने से रोक सकते थे।

मुझ को लगता है के अत्याचार होते देख मोन रहना भी इसी बात का प्रतीक है के आप उस अत्याचार में शामिल न होकर भी पापी हो गए। काफी समय तक उस घर के दरवाज़े पर अफसर साहब का खून से सना हाथ पंजा बना रहा था।

वकील साहब एक लाठी बाज़, निशानेबाज़ , कराटे बाज़ थे उन्होंने अपना काफी हद तक  बचाओं किया कुछ लोगो का कहना है के वकील साहब अपनी बेल्ट निकालना चाहते थे पर उसका बक्खल पेंट में फँस गया और सारे सूअर एक साथ टूट पड़े।

जब क़ातिलों ने देखा के अब यह खत्म हो जायेगा तो जाने लगे पर वकील साहब ने हिम्मत नही तोड़ी उन्होंने अपने पेट से निकली हुई आंतों, अंतड़ियों को पेट में डालने लगे तभी एक जल्लाद जिस का नाम “कांडा मन्नू” था उसने अपने साथिओं से कहा के यह पहले भी हमारी गोली लगने से बच चूका है अब दुबारा न बच जाये इस लिए इस की गर्दन ही काट दो!

यही हुआ जिस प्रकार आज आतंकवादी अबु बकर अल बगदादी लोगों की गर्दने काट रहा है उसी तरह वकील साहब की गर्दन काट दी इन आतंकवादिओं का यह इरादा था के गर्दन काट कर अपने साथ ले जाये गें पर वो अपने इरादे में कामयाब इस लिए नही हो पाये क्यों की जहां यह सब ज़ुल्म हो रहा था वही एक रेटार्डेड  पुलिसमैन ने अपने घर से ईंट का अद्धा फैंकर मारा जिस की वजह से वो ज़लील कामयाब न हो सके। सारे अत्याचारी वहां से भाग गए। मैं उन  महान बहादुर रेटार्डेड  पुलिसमैन को सलाम करता हूँ।

क़ातिल भाग कर एक मोलवी के घर जाकर अपने हत्यारों, कपड़ों  को धोया और नहाये बताने वाले बताते के हत्यार विदेश से मनाये गए थे और इस हत्या के पीछे बड़े छोटे कारोबारी , तजपूँजी नेता शामिल थे कुछ तजपूँजी नेता तो इस हत्या के बाद बड़े नेताओं में गिने जाने लगे थे। इस हत्या कांड में पूरा पुलिस प्रशासन खरीद लिया गया था।

इस हत्या कांड के बाद वकील साहब और अफसर आलम साहब का पूरा परिवार टूट चूका था कुछ मतलब परस्तों और अत्याचारों के समर्थकों ने इन दोनों का हमदर्द बनकर इस वारदात को कमज़ोर किया।

हत्यारों की संख्या 08-10 थी पर केस कमज़ोर करने के लिए 18लोगों के नाम लिखाये गए जो उचित नही था हत्या कांड में उन लोगों के नाम भी लिखवाये जो वहां न तो थे और न किसी साज़िश में शामिल थे। इस वजह से यह केस कमज़ोर रहा दूसरी वजह और अहम वजह थी उस समय की केंद्र सरकार के कुछ नेताओ ने क़ातिलों की सहायता की जिला जज को कुछ नेताओ के द्वारा ख़रीदा गया और जज का पैसला क़ातिलों के हिमायत में गया जिला अदालत के जज ने कहा के में जनता हूँ हत्यारे इन्ही में से हैं पर में मजबूर हूँ अदालत को यह सबूत नही मिल पाये के असल हत्यारा कौन है और सब के सब बा इज़्ज़त बरी हो गए। पिछले कई दशकों से केस हाई कोर्ट में है पर फाइल धूल मिटटी में दबी है और वकील साहब की आत्मा आज भी न्याय का इंतज़ार कर रही हैं।

असफर साहब (समाजिक कार्यकर्ता) ने अपने मित्र का साथ दिया इस कारण से एडवोकेट सईद अख्तर (कल्लन) के साथ उनकी भी हत्या कर दी मे उन अत्याचारी और उस समय के लुटिया चोर नेताओ पर लानत करता हो जो उस हत्या कांड मे शरीक रहे और उन लोगो का शुक्रया अदा करता हू जिन्होने उस समय हक़ का साथ दिया  लेकिन अफ़सोस की बात है जो लोगो के लिय इंसाफ की लड़ाई लड़ता था उस के हत्या करने वाले आज भी खुले आम घूम रहे है

मैं पूछता हूँ किया यही है न्याय पालिका का इंसाफ ?

क्या आज का आतकवादी अबु बकर अल बगदादी और इन हत्यारों में कोई अंतर है ?

क्या इन हत्यारों को समाज में किसी प्रकार की  इज़्ज़त मिलनी चाहये ?

क्या इन हत्यारों का समर्थन करने वाला मानवता का हत्यारा नही है ?

क्या इन हत्यारों का बहिष्कार नही होना चाहये  ?

नोट – मेरी यह सच्ची कहानी पूरी कहानी का सारांश है मेरा प्रयास है के एडवोकेट सईद अख्तर (कल्लन) ,अफसर आलम (सामाजिक कार्यकर्ता ) एवं एडवोकेट सईद अख्तर (कल्लन) की पत्नी को जल्द से जल्द न्याय मिले।



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