मेरा भारत महान

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Riyaz Abbas Abidi


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हलाला पुरुषों के लिए मानसिक सज़ा

Posted On: 18 Oct, 2016  
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3 तलाक़ पर राजनीति क्यों ?

Posted On: 17 Oct, 2016  
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अभी आज़ादी अधूरी है ?

Posted On: 14 Aug, 2016  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आपकी बात ठीक है । बहुत-सी कुप्रथाएं कई देशों में समाप्त हो चुकने के बावजूद हमारे देश में केवल धर्म के ठेकेदारों और वोटों के लालची लोगों के कारण ही चल रही हैं । स्त्री चाहे जिस भी धर्म या समुदाय की हो, उसे उसका उचित अधिकार और सम्मान मिलना ही चाहिए । स्त्री के साथ अन्याय करने वाली कोई भी प्रथा हो, उसे समाप्त होना ही चाहिए । आपके जैसे पढ़े-लिखे और सुलझे हुए लोगों को चाहिए कि मुस्लिम स्त्रियों को उनके अधिकारों के बारे में बताएं और अपने धर्म तथा धार्मिक पुस्तक की अशुद्ध व्याख्या का विरोध करें । केवल एक बात जो मैं अपनी ओर से कहना चाहूंगा, वह यह है कि स्त्रियों को शिक्षा और आगे बढ़ने के दिए अवसर दिए जाने चाहिए । तभी तो वे अपने अधिकारों को पहचान सकेंगी और अन्याय से बचने के लिए उचित कदम उठा सकेंगी । आपके समुदाय में महिलाओं की शिक्षा पर कितना ध्यान दिया जाता है और उन्हें सार्वजनिक जीवन में उतरने के लिए कितने अवसर दिए जाते हैं, यह आप बेहतर जानते हैं ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

आप यकीनन इस्लाम की बाबत मुझसे ज़्यादा जानते हैं । लेख में वर्णित आपके अधिकांश विचारों से मैं सहमत हूँ । लेकिन आप भी तो देखिए कि हलाला पुरुषों के लिए तो मानसिक सज़ा है पर महिलाओं के लिए क्या है ? पुरुष पर तो मानसिक भार आगे जाकर तब पड़ेगा जब वह हलाला से आई हुई अपनी बीवी से दोबारा निकाह करेगा लेकिन महिला के शरीर और आत्मा पर जो गुज़रेगी, वह तो पहले ही गुज़र जाएगी । उसके बाद वह चाहे अपने पहले खाविंद से दोबारा निकाह कर भी ले, क्या वह ताज़िन्दगी सामान्य हो सकेगी ? क्या जो कुछ उसके साथ हो चुका है, उसके बाद उसका मन एक ख़ुशनुमा ज़िंदगी जी सकने वाली औरत के मन में फिर से बदल सकेगा । आपकी बात ठीक है कि आधी-अधूरी जानकारी की बुनियाद पर बहस नहीं होनी चाहिए । लेकिन इस बात पर बहस की कोई गुंजाइश नहीं है कि औरत को इंसाफ़ मिलना चाहिए । मर्द को सज़ा देने के नाम पर औरत पर ज़ुल्म को जायज़ कैसे ठहराया जा सकता है ? और आज के ज़माने में, ख़ास तौर पर हमारे सेक्यूलर मुल्क में, पर्सनल लॉ जैसी चीज़ के होने का कोई मतलब नहीं है । पर्सनल लॉ के नाम पर कुदरती इंसाफ़ को दरकिनार नहीं किया जा सकता । इंसाफ़, इंसानियत और मुल्क पहले हैं, मजहब उसके बाद ही आता है । यह बात हर मजहब के मानने वालों के लिए है, सभी धर्मावलम्बियों पर लागू है ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

मैं लेख में वर्णित विचारों से सहमत हूँ । शर्मिला का संघर्ष महान है । कानून की ज़रूरत अपनी जगह है लेकिन शर्मिला को उसके विरुद्द अपना मैराथन अनशन उसके दुरुपयोग के कारण करना पड़ा । इसमें संदेह नहीं कि न केवल पूर्वोत्तर राज्यों में इस कानून का खुला दुरुपयोग हुआ है बल्कि सुदूर पूर्वोत्तर के निवासियों के प्रति दिल्ली में या दिल्ली के निकट रहने वाले उत्तर भारतीयों का दृष्टिकोण भी पूर्वाग्रह युक्त है । शर्मिला ने अनशन तोड़कर मुख्यधारा की राजनीति में सम्मिलित होने का निर्णय लिया है जो उनके अनशन करने के निर्णय जितना ही साहसिक है । यह उनका एक और संघर्ष होगा । उनका सशस्त्र बलों को अंधी ताक़त देने वाले कानून को हटवाने का मक़सद चाहे पूरा न हो सका हो लेकिन उनकी ईमानदारी और जूझने के जज़्बे को सलाम । जैसा कि कहते भी हैं - Some goals are so worthy that it's glorious even to fail.

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

मैं लेख में वर्णित विचारों से सहमत हूँ । शर्मिला का संघर्ष महान है । कानून की ज़रूरत अपनी जगह है लेकिन शर्मिला को उसके विरुद्द अपना मैराथन अनशन उसके दुरुपयोग के कारण करना पड़ा । इसमें संदेह नहीं कि न केवल पूर्वोत्तर राज्यों में इस कानून का खुला दुरुपयोग हुआ है बल्कि सुदूर पूर्वोत्तर के निवासियों के प्रति दिल्ली में या दिल्ली के निकट रहने वाले उत्तर भारतीयों का दृष्टिकोण भी पूर्वाग्रह युक्त है । शर्मिला ने अनशन तोड़कर मुख्यधारा की राजनीति में सम्मिलित होने का निर्णय लिया है जो उनके अनशन करने के निर्णय जितना ही साहसिक है । यह उनका एक और संघर्ष होगा । उनका सशस्त्र बलों को अंधी ताक़त देने वाले कानून को हटवाने का मक़सद चाहे पूरा न हो सका हो लेकिन उनकी ईमानदारी और जूझने के जज़्बे को सलाम । जैसा कि कहते भी हैं - Some goals are so worthy that it's even to fail.

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

के द्वारा: Riyaz Abbas Abidi Riyaz Abbas Abidi

रियाज़ अब्बास जी बहुत उम्दा योगदान के लिए धन्यवाद| तथ्यों समेत आपकी प्रस्तुति सराहनीय है| किसी भी कौम के हों चंद महत्वकांक्षी (selfish) लोगों के द्वारा ही देश में धार्मिक उन्माद फैलाने का प्रयास किया जा रहा है ताकि वे लोग अपनी रोटियां सेक सकें वर्ना देश के हर गली नुक्कड़ पर सभी धर्मों के अनुयायी एक दूसरे पर निर्भर भी हैं और मिलजुल कर रह भी रहे हैं किसी सच्चे देश वासी को देश के प्रति अपनी निष्ठा का प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं लेकिन इस बात का प्रचार करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है इसलिए आप जैसे बुद्धिजीवी लोग आगे बढ़ कर इसी तरह के लेख लिखते रहेंगे तो बहुत से अनभिज्ञ लोगों के सामने सचाई लाई जा सकेगी| उम्मीद है भविष्य में भी आपके लेख पढ़ने को मिलेंगे| धन्यवाद |

के द्वारा: bhagwandassmendiratta bhagwandassmendiratta




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